सुख दो प्रकार के होते हैं – एक अस्थायी सुख जो केवल भौतिक सुख-सुविधाओं से प्राप्त होता है और दूसरा अधिक स्थायी सुख जो मन के संपूर्ण परिवर्तन और विकास से प्राप्त होता है।
हम अपने जीवन में देख सकते हैं कि सुख का दूसरा रूप श्रेष्ठ है क्योंकि जब हमारी मानसिक स्थिति शांत और खुश होती है, तो हम छोटी-मोटी पीड़ाओं और शारीरिक असुविधाओं को आसानी से सहन कर लेते हैं। दूसरी ओर, जब हमारा मन बेचैन और परेशान होता है, तो सबसे आरामदायक भौतिक सुविधाएँ भी हमें खुश नहीं कर पातीं।
जिंदगी सफ़ल तभी है जब खुद का परिचय खुद ना देना पड़े। लोग हमारा सम्मान सिर्फ़ दो वजहों से करते हैं या तो हमारे पास ताकत है या हमारा व्यवहार मददगार है, पहला अस्थायी है, लेकिन दूसरा स्थायी है।
कोई इंसान तब सबसे ज़्यादा आकर्षक लगता है, जब वह हमें कुछ सिखाता है बिना ये महसूस कराए कि हम पहले से न जानकर मूर्ख हैं। खुशी मन की अच्छी होती है धन की नहीं क्योंकि धन की खुशी अहंकार को जन्म देती है और मन की खुशी संस्कारों को विकसित करती है।
ज्ञान और अनुभव व्यक्तिगत होते हैं,जबकि मनुष्यता सदैव परोन्मुखी होती है.अपने स्वार्थ की बात तो पशु भी जानते हैं!,
किंतु सच्चा मनुष्य वह है जो दूसरों के लिए अपना सुख छोड़ दे!!
मांता -पिता वो मंदिर हैं,,
जहां कोई चढ़ावा नहीं चढ़ाया जाता…
बस उनकी एक मुस्कान ही,,
होली का चंदन,और दिवाली की फुलझड़ी है..!!
आसपास के लोगों को बदलना हमारे हाथ में नहीं है। परन्तु हमें किनके आसपास रहना है, वो तय करना हमारे हाथ में है। जीवन के युध्द तो अर्जुन की तरह खुद ही लड़ने और जीतने होते हैं, ईश्वर सारथी से ज्यादा भूमिका अदा नही कर सकते।
सिर्फ अच्छे कर्मों से ही बात नहीं बनती। यह बात अधिक मायने रखती है कि हम किन लोगों के बीच में है, उनके जीवन के लक्ष्य क्या हैं? उनकी सोच और मानसिकता कैसी है? हम सब ने महंगे कपड़ो में घटिया लोग और सस्ते कपड़ो में महंगे लोग देखे हैं।
टूटना सितारों से सीखना होगा जो टूट कर भी ज़मी पर नहीं गिरते। दो बीजों की सोच:- एक बार दो बीज धरती में पड़े थे। पहला बीज सोचता था,“मैं बड़ा वृक्ष बनूंगा, लोगों को छाया दूंगा, फल दूंगा। मुझे प्रकाश और जल की ओर बढ़ना है।” दूसरा बीज डरता था,“अगर मैं अंकुरित हुआ तो कीड़े मुझे खा सकते हैं, धूप मुझे जला सकती है। मैं यहीं सुरक्षित हूँ।” समय बीता।
पहला बीज अंकुरित हुआ, बढ़ा और एक विशाल वृक्ष बन गया। दूसरा बीज वहीं मिट्टी में सड़ गया। “मन ही सब कुछ है।” जिसने सकारात्मक सोचा, वह विकसित हुआ। जिसने भय और नकारात्मकता को चुना वह समाप्त हो गया।
जैसे बिना पानी के नदी और बिना पैसे का पर्स बेकार होता है वैसे ही बिना प्रेम का परिवार व्यर्थ होता है। छोटी-छोटी बातों में प्रेम खत्म करने की बजाय हमें प्रेम से छोटी-छोटी बातों को खत्म कर देना चाहिए और रिश्तो में मिठास घोल देना चाहिए।
बूढ़े माता-पिता की आंखें संतान के वैभव को देखकर इतनी खुश नहीं होती जितनी पारिवारिक एकता और प्रेम को देखकर खुश होती है। खूबसूरत फर्नीचर से मकान सुंदर नहीं होता अपीतु प्रेम, त्याग और सहिष्णुता से ही परिवार का गौरव बढ़ता है….
डर हमें डराता है,क्रोध हमें गुस्सा दिलाता है, हमारा पीछा करता है। जिस चीज का सामना करने से हम डरते हैं, उसके करीब आने का इंतजार नही करना है उसके सामने जाकर खड़े हो जाना है, फिर देखना डर और क्रोध की जगह आत्मविश्वास और शांति से यह मन भर जाएगा।
एक संतुष्ट जीवन एक सफल जीवन से ज्यादा बेहतर है, क्योंकि सफलता का आंकलन दूसरों के द्वारा किया जाता है, लेकिन हमारी संतुष्टि का आंकलन हमारे दिल और दिमाग से होता है। प्रार्थना करने के लिए व्यक्ति को मंदिर में होना आवश्यक नहीं है, व्यक्ति के मन में ईश्वर का होना आवश्यक है।
!!!…दुनिया में हर कोई आपकी कहानी नहीं जानता…
फिर भी राय देने से नहीं चूकता…!!!
सुप्रभात
आप सभी का आज का दिन सुखमय हो

