इस इंजीनियरिंग मार्वल को देखिए—नब्बे डिग्री का सीधा मोड़। वही जगह, वही सड़क, जहाँ कोहरे भरी रात में युवराज इस मोड़ को देख नहीं पाया। और सच कहें तो सिर्फ़ कोहरा ही वजह नहीं था। साफ़ रात में भी यहाँ हादसा होना तय था। इतनी तीखी मोड़ वाली सड़क, सामने गड्ढा, नीचे पिट—यह किसी दुर्घटना का इंतज़ार नहीं, उसका न्योता है।
पिछले कई सालों से इंटरनेट पर इन “इंजीनियरिंग चमत्कारों” पर बहस होती रही है। और हर बार लोक निर्माण विभाग के तेज़-तर्रार इंजीनियर पूरी आत्मविश्वास से समझाते रहे कि ऐसे नब्बे डिग्री मोड़ क्यों ज़रूरी हैं। तर्क इतने तकनीकी होते हैं कि आम आदमी चुप हो जाए। इसी सड़क की तस्वीरें अमेरिका के सोशल मीडिया पर मीम बनकर घूमती रहीं—भारत और उसकी तकनीक का मज़ाक उड़ाते हुए। भारतीय होने के नाते खून खौलता है, लेकिन उससे ज़्यादा गुस्सा तब आता है जब अपने ही लोग इन्हें गर्व से “इंजीनियरिंग” कहते हैं।
इसी जगह कुछ दिन पहले एक ट्रक ड्राइवर भी कोहरे में यह मोड़ नहीं देख पाया। कोहरा हो या न हो—ऐसी सड़क बनाना ही अपराध है। ट्रक अस्थायी बैरिकेड तोड़ते हुए नीचे पिट में जा गिरा। किस्मत अच्छी थी—लोगों ने बचा लिया, वह ज़िंदा निकल गया। प्रशासन ने क्या किया? कुछ नहीं। वही टूटा बैरिकेड, वही अंधेरा, वही गंदा पानी।
कुछ दिन बाद उसी जगह युवराज पहुँचा। लेकिन तब तक अस्थायी बैरिकेड पहले ही टूट चुका था। इस बार किस्मत ने साथ नहीं दिया।
हमारे यहाँ सिस्टम को जगाने के लिए हमेशा एक मानव बलि चाहिए। इस बार वह बलि युवराज के रूप में मिली—एक युवा इंजीनियर। अब देखिए, वही विभाग हरकत में आ गया है। पिट भरेगा, सीवेज साफ़ होगा, पानी निकलेगा, स्थायी बैरिकेड लगेंगे, तेज़ रोशनी होगी, चेतावनी बोर्ड लगेंगे। सब कुछ होगा। क्योंकि अब एक जान जा चुकी है।
लेकिन यह भी स्थायी समाधान नहीं है। स्थायी समाधान यह नहीं कि हादसे के बाद मरम्मत की जाए। स्थायी समाधान यह है कि ऐसी सड़कें बनाई ही न जाएँ। और अगर किसी मजबूरी में बनानी ही हों, तो मोड़ से बहुत पहले स्पीड कंट्रोल की व्यवस्था हो, रोड डिज़ाइन ऐसा हो कि गाड़ी की रफ्तार अपने आप 30–35 किलोमीटर प्रति घंटा से ज़्यादा न हो।
सड़कें किताबों की ड्रॉइंग नहीं होतीं। उन पर इंसान चलते हैं। और जब इंजीनियरिंग संवेदनहीन हो जाती है, तब हर मोड़ पर कोई न कोई युवराज इंतज़ार कर रहा होता है—सिस्टम को जगाने के लिए।

