मुलायम सिंह यादव जी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे अपने नाराज़ साथियों को भी सम्मान देकर फिर से अपने साथ जोड़ लेते थे। उन्हें कार्यकर्ताओं को चेहरे और नाम से पहचानने की अद्भुत क्षमता थी।
यह घटना वर्ष 2006 की है। झांसी से सटे मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले के पृथ्वीपुर में नेताजी की एक जनसभा थी।
मंच पर दीपनारायण सिंह यादव, चंद्रपाल सिंह यादव सहित कई वरिष्ठ और युवा नेता मौजूद थे। लेकिन झांसी के पुराने समाजवादी नेता हरगोविंद कुशवाहा मंच पर न बैठकर नीचे श्रोताओं के बीच बैठे थे।
सभा के दौरान अचानक नेताजी की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने तुरंत मंच संचालक को इशारा कर कुशवाहा जी को मंच पर बुलाने को कहा। नाराज़ चल रहे कुशवाहा जी ने नीचे से ही हाथ जोड़कर संकेत दिया कि वे नीचे ही ठीक हैं, लेकिन नेताजी नहीं माने।
उन्होंने मंच पर बैठे नेताओं से कहा, “कुशवाहा अच्छा भाषण देते हैं, इन्हें मंच पर बुलाइए और बोलने का अवसर दीजिए।”
कुशवाहा जी मंच पर आए और नेताजी की ओर देखते हुए बोले, “नेता जी, आपको याद होगा जब हम कई-कई किलोमीटर साइकिल चलाकर उरई के गांव-गांव समाजवाद का प्रचार करने जाते थे।”
नेताजी मुस्कुराए और बोले, “हाँ, याद है।”
फिर कुशवाहा जी ने एक गांव का नाम लेते हुए कहा, “नेता जी, उसी गांव के कुएं के चबूतरे पर बैठकर हमने रोटी-सब्जी खाई थी और वहीं से चुनाव प्रचार किया था।”
नेताजी फिर मुस्कुराते हुए उनकी बात से सहमत हुए।
इसके बाद कुशवाहा जी ने तीखे अंदाज़ में कहा, “लेकिन नेता जी, आज अगर आप अपने आसपास नज़र दौड़ाइए तो न साइकिल दिखेगी और न समाजवादी विचारधारा। इसलिए अब समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह साइकिल नहीं, स्कॉर्पियो होना चाहिए।”
इतना सुनते ही मंच और सभा में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। लेकिन नेताजी बिना विचलित हुए शांत भाव से उनकी पूरी बात सुनते रहे।
भाषण समाप्त होने के बाद नेताजी ने कुशवाहा जी का हाथ पकड़ा, उन्हें अपने पास बैठाया और बगल में बैठे दीपनारायण सिंह यादव से कहा, “परसों इन्हें लखनऊ लेकर आना।”
दो दिन बाद दीपनारायण सिंह यादव उन्हें लखनऊ लेकर गए। नेताजी से मुलाकात हुई और कुछ ही दिनों बाद हरगोविंद कुशवाहा को झांसी विकास प्राधिकरण का उपाध्यक्ष बना दिया गया।
यह घटना बताती है कि नेताजी नाराज़ साथियों को डांटकर नहीं, बल्कि सम्मान देकर अपने साथ जोड़ते थे। शायद यही वजह थी कि उन्हें “धरती पुत्र” कहा जाता था।
सोचिए, आज अगर कोई स्थानीय नेता किसी बड़े नेता के सामने मंच से ही इतनी बेबाकी से अपनी नाराज़गी जाहिर कर दे, तो उसका क्या परिणाम होगा?
नेताजी हमेशा कहा करते थे—
“अमीरी-गरीबी का भेद मिटे, धर्म के आधार पर भेदभाव खत्म हो, ऊंच-नीच की भावना समाप्त हो, भाषा और क्षेत्र के नाम पर भेदभाव न रहे। जब समानता और संपन्नता साथ चलती हैं, तभी सच्चा समाजवाद बनता है।”
नाराज़गी नहीं, सम्मान से जीते दिल
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