जिला उपभोक्ता आयोग, संभल
मामले की पृष्ठभूमि
चंदौसी निवासी नितिन महाजन ने 11 मई 2024 को चंदौसी के एक स्थानीय दुकानदार से वोल्टास कंपनी की एयर कंडीशनर खरीदी थी। खरीद के कुछ ही समय बाद एसी में तकनीकी खराबियां सामने आने लगीं और वह शुरू से ही सुचारू रूप से कार्य नहीं कर रही थी। बार-बार खराब होने पर नितिन महाजन द्वारा की गई शिकायतों के बाद कंपनी अथवा दुकानदार की ओर से अस्थायी रूप से मरम्मत कराई जाती रही, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका।
दुकानदार और कंपनी की उदासीनता
एक वर्ष के भीतर कई बार एसी खराब होने पर नितिन महाजन ने दुकानदार से एसी बदलने अथवा उसकी कीमत वापस करने का आग्रह किया। हालांकि दुकानदार और कंपनी दोनों ने उनकी मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया और शिकायत को गंभीरता से लेने से इनकार कर दिया। लगातार हो रही परेशानी और आर्थिक नुकसान से परेशान होकर नितिन महाजन ने उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता लवमोहन वार्ष्णेय से संपर्क किया।
जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद
अधिवक्ता लवमोहन वार्ष्णेय द्वारा नितिन महाजन की ओर से जिला उपभोक्ता आयोग, संभल में एक परिवाद दायर किया गया। परिवाद में आयोग को बताया गया कि कंपनी ने दुकानदार के माध्यम से एक दोषयुक्त उत्पाद उपभोक्ता को बेचा है, जिसमें निर्माण संबंधी गंभीर खामियां मौजूद हैं। यह स्पष्ट रूप से उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है।
आयोग के समक्ष पक्षों की सुनवाई
आयोग द्वारा वोल्टास कंपनी और संबंधित दुकानदार को तलब किया गया। सुनवाई के दौरान दुकानदार आयोग के समक्ष उपस्थित हुआ और उसने स्पष्ट रूप से कहा कि मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट के लिए कंपनी की जिम्मेदारी बनती है। इसके विपरीत कंपनी की ओर से कोई भी प्रतिनिधि आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आयोग ने मामले पर विचार किया।
जिला उपभोक्ता आयोग का आदेश
जिला उपभोक्ता आयोग ने परिवादी नितिन महाजन के पक्ष में निर्णय देते हुए विपक्षी संख्या एक वोल्टास/टाटा इंडिया लिमिटेड को आदेशित किया कि वह विवादित एसी को उसी मेक और मॉडल की नई एसी से दो माह के भीतर बदलकर प्रदान करे। वैकल्पिक रूप से कंपनी को एसी का क्रय मूल्य ₹37,000 परिवाद दायर करने की तिथि से 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करने का भी निर्देश दिया गया।
मुआवजा और अतिरिक्त भुगतान
इसके अतिरिक्त आयोग ने कंपनी को परिवादी को ₹10,000 मानसिक कष्ट एवं आर्थिक क्षति के रूप में तथा ₹5,000 वाद व्यय के रूप में अदा करने का भी आदेश दिया। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो देय राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से भुगतान करना होगा।

