कर्ण को निहत्था मारा गया—यह बात अक्सर कही जाती है।
लेकिन महाभारत केवल यह नहीं बताती कि अंत में क्या हुआ, वह यह भी पूछती है कि उससे पहले किसने क्या किया।
जब अभिमन्यु अकेला था, तब युद्ध के नियम कहाँ थे?
जब द्रौपदी का अपमान हो रहा था, तब धर्म की आवाज़ कहाँ थी? और सबसे बड़ी बात जब कौरव-पांडवों के बीच गुरुकुल से लौटकर शक्ति प्रदर्शन हो रहा था, तब केवल दुर्योधन ने उसे अंग का राजा बनाकर इस प्रतियोगिता में उतारा, उसका लक्ष्य था कि अर्जुन किसी भी कीमत पर जीतने न पाए। कर्ण ने उसे सच्ची दोस्ती माना और दोस्ती को धर्म लेकिन वहां प्रोटोकॊल केवल राजकुमारों के बीच प्रतियोगिता का था। शार्टरूट से कर्ण ने इस प्रोटोकॊल को तोड़ा और प्रतियोगिता में शामिल हो गया। न तो उसने अंग प्रदेश को अपने दमखम पर जीता था और न ही उसे विरासत में मिला था। केवल खैरात में मिले राज्य से खुद को अंगराज और दानवीर कहलाने लगा था। यही सबसे बड़ा अधर्म था।
महाभारत सिखाती है कि अधर्म के साथ खड़े होने की कीमत, एक दिन स्वयं भी चुकानी पड़ती है। उस पर भी अधर्म करने के साथ अल्पज्ञानी को मित्र बनाया तो पतन तो तय था ही ….
इसलिए किसी भी पात्र का मूल्यांकन केवल उसके अंतिम क्षण से नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन और कर्मों से करना चाहिए…

