लखनऊ के अशोक बहार की कहानी उन लोगों के लिए जवाब है जो कहते हैं कि अब बहुत देर हो चुकी है।
अशोक बहार ने अपनी माँ से वादा किया था कि वह एक दिन डॉक्टर बनेंगे। लेकिन जीवन की जिम्मेदारियों, परिस्थितियों और समय के साथ यह सपना अधूरा रह गया। बहुत से लोग ऐसे सपनों को किस्मत मानकर भूल जाते हैं, लेकिन अशोक बहार ने नहीं भुलाया।
71 वर्ष की उम्र में उन्होंने फिर किताबें उठाईं, पढ़ाई शुरू की और NEET परीक्षा में बैठकर साबित कर दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती।
जब लोग रिटायरमेंट के बाद आराम की सोचते हैं, तब अशोक बहार अपने जीवन के सबसे बड़े लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश में जुटे हैं। उनकी कहानी सिर्फ डॉक्टर बनने की नहीं, बल्कि उस जिद की कहानी है जो कहती है—
“अगर सपना जिंदा है, तो उम्र सिर्फ एक संख्या है।”
लखनऊ के इस बुजुर्ग ने लाखों युवाओं को एक संदेश दिया है:
हार मानने का सही समय कभी नहीं आता, लेकिन फिर से शुरुआत करने का समय हमेशा होता है।

