रमज़ान उल-मुबारक इस्लामी सन् का वो पाक महीना है जो रहमत, बरकत और मग़फ़िरत का पैग़ाम लेकर आता है। ये सिर्फ भूख-प्यास सहने का नाम नहीं, बल्कि तज़किया-ए-नफ़्स (आत्मशुद्धि), एहतेसाब और इबादत का बेहतरीन मौका है। इस महीने में बंदा अपने रब की क़ुर्बत हासिल करने और अपने गुनाहों से तौबा करने की कोशिश करता है।
रोज़ा इस महीने की सबसे अहम इबादत है। सहरी से लेकर इफ्तार तक इंसान न सिर्फ खाने-पीने से रुकता है, बल्कि झूठ, ग़ीबत, बुरे ख़यालात और बदअख़लाक़ी से भी खुद को दूर रखने की मश्क करता है। दरअसल रोज़ा सब्र, तहम्मुल और परहेज़गारी का अमली सबक है, रमज़ान वो महीना है जिसमें कुरआन-ए-करीम नाज़िल हुआ, इसलिए इस महीने में तिलावत-ए-कुरआन, तरावीह और दुआओं का ख़ास एहतमाम किया जाता है। मसाजिद का माहौल रूहानियत से सराबोर हो जाता है और हर तरफ इबादत की फ़िज़ा कायम होती है। ये महीना हमदर्दी और मुसावात का भी दर्स देता है। जब अमीर-ओ-ग़रीब एक जैसी भूख महसूस करते हैं, तो दिलों में रहम और इनसाफ़ का जज़्बा पैदा होता है। ज़कात और सदक़ा देने की रवायत इसी जज़्बे को मज़बूत करती है, जिससे समाज में मोहब्बत और भाईचारा बढ़ता है।
आज के इस दौर में, जहाँ दुनिया माद्दियत और नफ़्स की ख्वाहिशों में उलझी हुई है, रमज़ान हमें मुहासबा-ए-नफ़्स (आत्मचिंतन) का पैग़ाम देता है। ये याद दिलाता है कि असली कामयाबी दौलत में नहीं, बल्कि अख़लाक़, सब्र और नेक अमल में है। अगर हम इस मुबारक महीने में अपने किरदार, अपनी नीयत और अपने रवैये को बेहतर बना लें, तो यही रमज़ान की असली कामयाबी और रूहानी फतह होगी।
रमज़ान: तज़किया -ए- नफ़्स, सब्र और इंसानियत का मुबारक महीना
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